"बच्चे में विकास के किन पहलुओं पर जोर देता है एक प्ले या प्री-प्राइमरी स्कूल"

शारीरिक विकास:-
जब एक बच्चा पहली बार प्ले या नर्सरी स्कूल में जाता है तो अभी भी वह डगमगा कर ही चल रहा होता है | वह अक्सर चलते या दौड़ते हुए गिर जाता है | वह बिना सहारे के सही से सीढ़ियाँ भी नहीं चढ़ सकता क्योकि उसकी मांसपेशियाँ अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती हैं |
नर्सरी स्कूल बच्चे के आंतरिक और बाह्य विकास के लिए उचित परिवेश उपलब्ध कराते हैं | ये स्कूल बच्चों की छोटी और मानसिक माँसपेशियों के विकास के लिए आंतरिक गतिविधियों पर जोर देते हैं | जैसे -पेपर फाड़ना ,पेपर को काटना ,पेपर को चिपकाना ,चित्रकारी करना और धागे में मोती पिरोना इत्यादि |
इसी तरह मजबूत माँसपेशियों के विकास के लिए बाहय गतिविधियों पर जोर देते हैं | जैसे -पेड़ पर चढ़ना ,कूदना ,फिसलपट्टी पर फिसलना ,झूले झूलना और पेडलिंग आदि |
ये गतिविधियाँ बच्चों के आंतरिक और बाहरी विकास के लिए आवश्यक होती हैं और बच्चा जब इन्हें अपने हमउम्र साथियों के साथ मिलकर करता है तो उसकी खुशी एक अलग ही स्तर पर होती है जिसे अभिभावक उसके घर लौटने पर (बच्चे के )उसके चेहरे पर झलकते हुए साफ़ देख सकते हैं |

अच्छी आदतों का विकास :-
एक प्ले स्कूल में बच्चों को एक नियमित अंतराल के बाद हाथ धोने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है और टॉयलेट लेके जाया जाता है | ये सब करने पर बच्चो को कभी -कभी टॉफ़ी या चॉकलेट दे दी जाती है | बच्चे भी ख़ुश होते हैं और धीरे -धीरे ये समझने लगते हैं कि ये एक अच्छा काम है जिसके करने पर हमें ईनाम मिल रहा है |
नर्सरी स्कूल में बच्चों को कठपुतलियों और कहानियों की सहायता से बताया जाता है कि उनके लिए दाँत साफ़ करना ,बाल बनाना और नहाना कितना आवश्यक है| बच्चों के साथ यहाँ एक खुले माहौल में बात की जाती है | उन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं होता | ये सारी गतिविधियाँ अच्छी और निरंतर होने वाली स्वस्थ आदतों के विकास में मदद करती हैं | यहाँ बच्चों को अपना काम स्वयं करके आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है |

सामाजिक विकास :-

प्ले स्कूल में बच्चों के लिए आवश्यक सामाजि व्यवहार के विकास पर भी जोर दिया जाता है|बच्चों को प्रोत्सहित किया जाता है की वो अपने खिलौनों से दूसरे बच्चों के साथ मिलकर खेलें |अपना खाना बाँटकर खायें ,अपनी बारी का इंतजार करें और स्कूल की संपत्ति का ध्यान रखें |इस तरह बच्चा अपने आप धीरे -धीरे सहयोग और त्याग की भावनाएँ अपने अंदर विकसित करने लगता है ,जो आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बनने में उसकी मदद करतीं हैं |

भावनात्मक विकास :-

जब एक बच्चा पहली बार प्ले स्कूल आता है तो वह अपनी भावनाओं पर नियन्त्रण करने में असमर्थ होता है |वह ना तो किसी चीज के लिए 'ना 'सुन सकता है और ना ही अपनी बारी का इंतजार कर सकता है |लेकिन प्ले स्कूल में उसे टीचर का उचित और संरक्षित मार्गदर्शन मिलता है जिससे वह अपनी भावनाओं पर पहले से बेहतर नियन्त्रण कर पाता है और प्ले स्कूल पूरा होते -होते यह नियन्त्रण उसकी आदतों मेँ शुमार होता चला जाता है |

सौंदर्यात्मक विकास :-

हमारे वातावरण में बच्चे के आस -पास बहुत -सी सुन्दर चीजें होती हैं लेकिन जब तक हम उसका ध्यान उन चीजों की और नहीं खींचते वो खुद से उन्हें नहीं समझ पाता |हमें बच्चों को समझाना चाहिये की प्रकृति ने जो सुंदर चीज़ें हमें दी है हमें उनकी कद्र करनी चाहिए | जैसे-सुंदर-सुंदर फूल ,रंग-बिरंगी तितलियाँ और पेड़-पौधों का का मनमोहक नजारा|| प्ले स्कूल में बच्चों को प्रकृति के करीब ले जाकर सिखाने की कोशिश की जाती है |

भाषा का विकास :-

एक बच्चे का भाषायी विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसे बोलने का कितना मौका मिल रहा है | वह जिन बातों को सुन रहा है ,उनका उच्चारण कितना सही है | एक नर्सरी स्कूल में बच्चे को मुक्त वार्तालाप का माहौल बनाकर दिया जाता है | वहाँ उन्हें नए शब्द सिखाये जाते हैं और उन शब्दोँ का बार-बार और तब तक उच्चारण और प्रयोग किया जाता है जब तक वे बच्चे के शब्दकोश में शामिल ना हो जायें | बच्चों को लगातार कहानियाँ पढ़कर सुनाई जाती हैं ,उन्हें समूह में सब बच्चो के साथ बैठकर बातें करने और अपने अनुभव बताने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ,बच्चों के साथ मिलकर छोटी-छोटी नई कहानियाँ बनाई जाती हैं | इस तरह प्ले स्कूल बच्चों की भाषा के विकास में अहम योगदान प्रदान करते हैं |

सर्जनात्मक विकास :-

एक बच्चे का सर्जनात्मक या रचनात्मक विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसको अपनी बात रखने और अपने विचार अभिव्यक्त करने के कितने अवसर दिये जाते हैं | एक नर्सरी स्कूल में उसे कला,चित्रकारी,नाट्यरूपांतरण,गाने-बजाने और कठपुतलीयों के खेल के माध्यम से ये सब करने का मौका मिलता है | प्ले स्कूल में बच्चा जिस किसी भी रचनात्मक काम में रुचि दिखाता है ,उसमे उसकी मदद की जाती है और उसकी पसंद की रचनात्मक चीज बनाने के लिए जरूरी सामान उपलब्ध कराया जाता है |

तार्किक विकास :-

एक छोटे बच्चे का स्वभाव बहुत ही उत्सुकता वाला होता है | वह हमेशा कुछ ना कुछ पूछता ही रहता है| एक बच्चे के लिए ये बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि उसके सवालों का जवाब किस तरह से दिया जाता है,कैसे उसकी उत्सुकता शांत की जाती है ,क्योंकि ये सब बातें उसे मानसिक रूप से प्रभावित करती हैं | ऐसे समय में बच्चे को खुद से अपने सवालोँ के जवाब ढूँढने के लिए प्रेरित करना चाहिए|उसे रटे-रटाये उत्तर देने की बजाय अपना खुद का निष्कर्ष निकालने की दिशा में बढ़ावा देना चाहिए | ऐसा करने से वह उस संसार को और भी करीब से जान सकता है जहाँ वह रहता है | यह सब करते -करते उसकी उत्सुकता उसे और नए अनुभवों की और ले जाती है और इस तरह एक प्ले स्कूल बच्चे के तार्किक विकास में एक बड़ा मददगार साबित हो सकता है                 



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