प्रारंभिक बचपन की देखभाल व शिक्षा

 
प्रारंभिक बचपन की अवधि बच्चे के जन्म के बाद से 8वर्ष तक मानी गई है।यहाँ प्रारंभिक बचपन की देखभाल से तात्पर्य उन तथ्यों को पहचानने से है जो बच्चों की सुरक्षा और पालन-पोषण के लिए आवश्यक है।बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने के साथ-साथ उनकी मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक आवश्यकताएँ भी पूरी होनी चाहिए।

‌'प्रारंभिक बचपन की शिक्षा' का अर्थ है -वह प्रकिया जिसमे बच्चा अपना ज्ञान और कौशल बढ़ाता है।समय के साथ-साथ नई आदतें और मनोभाव सीखता और बनाता है।यह बच्चों के आंतरिक विकास के लिए बहुत आवश्यक है।
‌प्रारंभिक शिक्षा का महत्वपूर्ण बिंदु है खेल :-
‌प्रारंभिक बचपन की शिक्षा पूरी तरह से बाल केंद्रित है अर्थात बच्चे के इर्द- गिर्द ही घूमती है।इस कारण इसमें खेल की महत्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।. बच्चों को सक्रिय रुप से खोजबीन करने, कुशलतापूर्वक काम करने और दूसरों से मिलने-जुलने का वातावरण प्रदान करते हैं।खेल बचपन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।खेल-खेल में बच्चा अपने आस-पास की दुनिया से सीखता है और अपने अंदर की भावनात्मक दुनिया में नित्य नये प्रयोग करता है।
बच्चे के लिए बहुत जरूरी है कि वह अपने आस- पास की प्राकृतिक चीजों के साथ खेले।
सादी मिट्टी, चिकनी मिट्टी, पेड़ के पत्ते और पानी ये ऐसी प्राकृतिक चीजें हैं जिनके साथ खेलकर बच्चा नए अनुभव सीख सकता है।


क्यों जरूरी है प्रारंभिक बचपन की शिक्षा?

‌प्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा का सीधा संबंध प्ले या प्री-प्राइमरी अर्थात पूर्व-प्राथमिक विद्यालय से है।प्रारंभिक बचपन की शिक्षा बच्चे के सम्पूर्ण विकास के लिए बहुत ही आवश्यक है।बच्चे के जीवन के पहले 6 साल बहुत ही नाजुक होते हैं क्योंकि इस समय बच्चे के विकास की गति जीवन की बाकी अवस्थाओं की तुलना में बहुत तेज होती है।इन शुरूआती वर्षों में बच्चों को विशेषरूप से एक प्रेरणादायक वातावरण प्रदान करना चाहिए।
‌इस अवस्था में बच्चे के लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि वहाँ बच्चे को विविधता भरी चीजें, अलग जगह और अलग अनुभव मिलते हैं जहाँ बच्चा खुलकर  विचार रखता है।प्री-प्राइमरी स्कूलों का उद्देश्य बच्चे को अर्थपूर्ण अवसर उपलब्ध कराना है।यहाँ बच्चे को सिखाया जाता है कि वह अपने हमउम्र और अपने से बड़े लोगों के सामने कैसे अपने विचार रख सकता है।यहाँ बच्चे को भावनात्मक रूप से सुरक्षित और सहयोगी वातावरण मिलता है।

आज के समय में क्यों महसूस हो रही है प्ले या प्री-प्राइमरी स्कूलों की जरूरत?

‌आज की इस दौड़भाग भरी जिंदगी में अभिभावकों को अपने नन्हे-मुन्नों के लिए प्ले स्कूल एक बेहतर विकल्प लगता है।इसके कई कारण हैं जो उभरकर सामने आए हैं।

1★कामकाजी महिलाओं की बढ़ती संख्या-आज की महंगाई के इस युग में ज्यादातर महिलाएं काम करना चाहती हैं।घर से बाहर निकलकर जॉब करना चाहती हैं ताकि आमदनी में थोड़ी बढ़ोतरी हो और वो परिवार का जीवनस्तर और बेहतर कर सके।शहरीकरण ने संयुक्त परिवारों को तोड़ दिया है और इस वजह से माँ अपने बच्चों को अकेला घर पर छोड़कर काम के लिए बाहर नहीं जा सकती।ऐसी परिस्थितियों में कामकाजी महिलाओं के लिए प्ले स्कूल एक अच्छा विकल्प है जहाँ वो अपने बच्चों को निश्चिन्त होकर छोड़ सकती है।
‌कामकाजी माँ बच्चे को अधिक समय नहीं दे पाती और ना ढंग से देखभाल कर पाती क्योंकि वह हर समय बच्चे के साथ नहीं होती।ऐसे में पूर्व-प्राथमिक शैक्षिक केंद्र उनके बच्चों की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं और उन्हें जीवन के लिए जरूरी छोटे-छोटे नियमों से अवगत कराते हैं।

2★जगह की कमी-एक प्री-स्कूल में जाने वाला बच्चा शारीरिक गतिविधियों में भाग लेने लगता है जैसे अलग-अलग तरह के खेल।खेल खेलने के लिए बच्चों को जगह की जरूरत होती है।लेकिन जनसंख्या के बढ़ते दबाव और शहरीकरण के कारण रहने लायक जगह सिकुड़ती जा रही है।शहरों में ज्यादातर परिवार छोटे-छोटे घरों में रहते हैं और आजकल तो छोटे-छोटे घर भी सिकुड़कर बस एक कमरे के रह गए हैं।ऐसे में बच्चे को न तो खेलने के लिए जगह मिलती है और ना ही दौड़ने-भागने के लिए।ऐसे में प्ले स्कूल इस समस्या के समाधान के रूप में एक बेहतर विकल्प बनकर उभरें हैं।

3★प्राइमरी स्कूल के लिए तैयारी-कोई भी बच्चा यदि प्राइमरी स्कूल में दाखिले से पहले प्ले स्कूल में जा चुका होता है तो उसे स्कूल के वातावरण में सहजता महसूस होती है और ऐसे में उसका प्रदर्शन वहाँ बेहतर दिखाई पड़ता है।वह उन बच्चों की अपेक्षा अच्छे से सामंजस्य बिठा पाता है जिनका दाखिला सीधे प्राइमरी स्कूल में ही हुआ है।

4★समान आयु समूह-एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण अधिकतर बच्चों के हमउम्र साथी नही होते।अभिभावकों के पास भी उन्हें सबसे मिलवाने या घुमाने ले जाने का समय नहीं होता।ऐसे में प्री-स्कूल में बच्चा अपनी उम्र के और बच्चों से मिलता है।उनके साथ खेलता है और ऐसे धीरे-धीरे वो सामाजिक परिवेश में प्रवेश कर जाता है।वो चीजों को बाँटना सीखता है, अपनी बारी का इन्तजार करना सीखता है,हमउम्र बच्चों के साथ रहते-रहते वह दूसरों की मदद करना भी सीख जाता है।

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